प्रयाग का महत्व

स्थलीय और खगोलीय ब्रह्मांड में प्रयाग के महत्व को व्यापक रूप से जाना जाता है। संगम के पवित्र जल में स्नान करके पापों से मुक्ति मिल जाती है। कुम्भ के दौरान इस स्नान का महत्व और बढ़ जाता है ।

प्रयाग के तीर्थस्थल

पुराणों के अनुसार प्रयाग में साढ़े तीन करोड़ तीर्थस्थल हैं ।इसमें स्वर्ग, पृथ्वी और पाताललोक के एक-एक करोड़ और वातावरण के पचास लाख तीर्थस्थल शामिल हैं । पद्म पुराण के स्वर्गखंड में कहा गया है कि बीस करोड़ और दस हजार तीर्थ प्रयाग में सनातन रूप से मौजूद हैं।यह भारत की जनसँख्या का लगभग २० प्रतिशत है ।भारत तीर्थ की भूमि है. यह नंदिनी और कामधेनु की तरह पवित्र गायों का जन्म स्थान है, और यह कथा है कि नंदिनी के शरीर से राजा विश्वरथ की सेना को हराने के लिए असंख्य सैनिक प्रकट हुए थे ।

कुम्भ स्नान का समय

माघ मास का स्नान पौष शुक्ल एकादशी या पूर्णमासी या अमावस्या से प्रारंभ हो जाता है ।स्नान करने का सबसे उत्तम समय रात्रि में सितारों के निकलने पर होता है मध्यम समय सितारों के अस्त होने के समय होता है और सूर्योदय के बाद का समय सबसे कम शुभकारी होता है ।माघ के माह में यहाँ रहने वाले कल्पवास , यज्ञ, शैय्या , गोदान, ब्राह्मणभोज, गंगापूजा, बेनीमाधवपूजा, व्रत और दान करते हैं ।

पंचकोसी परिक्रमा प्रक्रिया और प्रयाग का मार्ग

प्रथम दिन: त्रिवेणी में स्नान, देव पूजा, पवित्र प्रतिज्ञा और अक्षयवट एवं सुल्तानकेश्वर की पूजा, इसके बाद सुधारासतीर्थ, उर्वशीकुण्ड और बेनीमाधवकुण्ड की यात्रा की जाती है फिर नदी किनारे की ओर से, हनुमान तीर्थ, सीताकुण्ड , रामतीर्थ, वरुणतीर्थ और चक्रमाधव, और सोमेश्वर की यात्रा की जाती है ।

दूसरा दिन: नदी के किनारे की ओर से यात्रा, सोमतीर्थ, सूर्यतीर्थ, कुबेरतीर्थ, वायुतीर्थ और अग्नितीर्थ की अर्चना करें ,महाप्रभु वल्लभाचार्य के प्रवचन सुनें , नैनी गांव की यात्रा कर गदा माधव और कम्बलाश्वातर तीर्थ पर प्रार्थना करें एवं रात्रि रामसागर पर व्यतीत करें।

तीसरा दिन : यमुना के तट पर बिकार देवरिया में रहने के लिए उचित व्यवस्था है । यहाँ का श्राद्ध विशेष महत्व रखता है ।

चौथा दिन : यमुना नदी के उस पार, वनखंडी शिव या बेगम राय के पवित्र स्थान पर रात के रुकने के लिए उचित व्यवस्था है ।

पांचवा दिन : नीम घाट के माध्यम से द्रौपदीघाट पहुँच कर रुकें।

छठवा दिन: शिवकोटितीर्थ पर रात्रि व्यतीत करें ।

सांतवा दिन: पडिला महादेव पर प्रार्थना करें ,मानसतीर्थ की यात्रा करें ।

आठवां दिन: झूंसी के माध्यम से नागतीर्थ की यात्रा करें ।

नौंवा दिन : नाग तीर्थ, शंख माधव, व्यास आश्रम, समुद्र कूप, संकष्ट हर्मधाव ,सांध्य वट, हंस कूप , हंस तीर्थ, ब्रह्माकुंड, उर्वशी तीर्थ और अरुंधति तीर्थ की यात्रा कर झूंसी पहुचें ।

दसवां दिन : त्रिवेणी के दर्शन कर, बहिर वेदी की परिक्रमा करें ।

ग्यारहवा दिन : अंतर वेदी की परिक्रमा कर रात्रि व्यतीत करें।

बारहवां दिन : त्रिवेणी में स्नान करें ,वट में प्रार्थना करें इसके बाद मधुकुल्या , घृत कुल्या , निरंजन तीर्थ, आदित्य तीर्थ,ऋण मोचन तीर्थ, पापमोचन तीर्थ, गोदोहन तीर्थ, सोम तीर्थ, सरस्वती कुण्ड , कामेश्वर तीर्थ, बरुआ घाट, ताक्षकेश्वर , तथाक कुंड, कालिया दाह, वक्र तीर्थ, सिन्धुसागर तीर्थयात्रा , पांडव कूप औरवरुण कूप के दर्शन करें एवं द्रव्येश्वर्नाथ पर श्रधासुमन अर्पित करें. तत्पश्चात सूर्यकुंड की यात्रा करें एवं भरद्वाज आश्रम में रात्रिशयन करें. प्रातःकाल नाग वासुकी एवं बेनी माधव पे दर्शन करें, दशाश्वमेध घाट पर भगवान् शिव की आराधना करें, एवं लक्ष्मी तीर्थ, उर्वशी तीर्थ , दत्ता तीर्थ , सोम दुर्वासा और हनुमानजी के दर्शन उपरांत परिक्रमा को त्रिवेणी पर समाप्त करें। उसके उपरांत गोदान करें एवं यथाशक्ति ब्राह्मण भोज करावें, भगवान् विष्णु की आराधना करें एवं परिक्रमा उन्हें समर्पित करें। चैत्र कृष्णा के तीसरे दिन से अमावस्या तक ये बारह दिवसीय परिक्रमा हर साल करनी चाहिए ।